'समुद्र की मुन्नी" जी हां, डॉल्फिन को समुद्र की मुन्नी कहा जाये तो शायद
कोई अतिश्योक्ति न होगी। डॉल्फिन भले ही जल चर हो लेकिन मनुष्यों के साथ
डॉल्फिन का कार्य-व्यवहार दोस्ताना होता है। विशेषज्ञों की मानें तो
डॉल्फिन का विश्वास व सोच मनुष्यों की भांति ही होता है। अमूमन डॉल्फिन
अकेले रहना पसंद नहीं करती क्योंकि उसे अकेलापन अच्छा नहीं लगता। लिहाजा
डॉल्फिन समूह में रहती है। समूह में आैसत दस से बारह सदस्य होते हैं।
डॉल्फिन सामान्यत: आवाज व ध्वनि तरंगों से एक दूसरे की पहचान करती हैं। खास
बात यह होती है कि उसकी मुंह से निकली ध्वनि तरंगें अन्य जीव-जंतुओं से
टकरा कर वापस लौट आती हैं जिससे डॉल्फिन के लिए यह जानना आसान हो जाता है
कि शिकार कितना बड़ा व कितना करीब है। डॉल्फिन आपस में बातचीत करते हैं तो
सीटियों की आवाज निकलती है। यूं कहा जाये कि उनकी बातचीत सीटियों की ध्वनि
तरंगों पर आधारित होती है तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। डॉल्फिन के चलने
की रफ्तार साठ किलोमीटर प्रति घंटा होती है। कभी कभी डॉल्फिन इससे भी अधिक
रफ्तार में चलती हैं। खास बात यह है कि डॉल्फिन जल चर होती है लेकिन पानी
के अंदर सास (श्वांस) नहीं लेती। सास लेने के लिए डाल्फिन हर दस से पन्द्रह
मिनट पर पानी के उपर आती रहती है। डॉल्फिन की याददाश्त जबर्दस्त होती है।
विशेषज्ञों की मानें तो डॉल्फिन बीस वर्ष के बाद भी ध्वनि तरंग को याद रखने
में समर्थ होती है। कोई डॉल्फिन साथी बिछड़ जाये तो वर्षों बाद भी वह ध्वनि
तरंगों से पहचान लेगी। डॉल्फिन पार्क सबसे अधिक जापान में पाये जाते हैं।
हालांकि थाईलैण्ड व सिंगापुर में भी काफी तादाद में डॉल्फिन पार्क हैं।
डॉल्फिन पार्क में घूमने-फिरने आने-जाने वालों की संख्या बहुतायत में होती
है। देश में डॉल्फिन का अस्तित्व खतरे में माना जा रहा है क्योंकि डॉल्फिन
की संख्या दिनो
दिन
कम होती जा रही है। देश में डॉल्फिन खास तौर से गंगा, उसकी सहायक नदियों व
ब्राह्मपुत्र नदी में पायी जाती है। इन नदियों की धाराओं में एक दशक पहले
डॉल्फिन की संख्या आठ सौ से अधिक थी। बनारस में गंगा के घाटों पर भी पहले
कभी-कभी डॉल्फिन दिख जाती थी लेकिन अब डॉल्फिन बनारस में गंगा के घाटों पर
नहीं दिखती। शायद यही कारण रहा होगा जिससे कि डॉल्फिन का अस्तित्व संकट में
देख कर भारत सरकार ने वर्ष 2010 में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत
डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया था। डॉल्फिन की आबादी या उनकी
संख्या देख कर नदी की सेहत या उसके जल की शुद्धता का अनुमान लगाया जा सकता
है। ऐसा नहीं है कि डॉल्फिन की अस्तित्व रक्षा के लिए देश में कहीं कुछ
नहीं हो रहा है। बिहार की राज्य सरकार ने जलीय जीव डॉल्फिन के संरक्षण व
अस्तित्व विकास के लिए डॉल्फिन शोध केन्द्र बनाने का एलान किया है। शोध एवं
अनुसंधान के इसी क्रम में आस्ट्रेलिया में डॉल्फिन की एक नयी प्रजाति
वैज्ञानिकों को मिली है। जिससे डॉल्फिन की वंश परम्परा को प्रोत्साहन व बल
मिलेगा। डॉल्फिन की अस्तित्व रक्षा के लिए नदी में जल प्रवाह होने के साथ
साथ गहराई भी होनी चाहिये क्योंकि नदी की गहराई व जल प्रवाह ही डॉल्फिन के
जीवन का आधार है। डॉल्फिन इंसान का एक अच्छा दोस्त भी है। इसलिये डॉल्फिन
के जीवन को बचाने के लिए नदियों में जल प्रवाह व जल की शुद्धता लाने की भी
सार्थक कोशिश होनी चाहिए ताकि डॉल्फिन के साथ खुल कर मनोरंजन कर सकें।
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