खा खा के मोटापे के शिकार हुए , कुत्तों को दूध और बिस्कुट खिलाने वाले भूख की कीमत क्या जानेंगे। देश का दुर्भाग्य लगभग 40 फीसदी लोग भूख या कुपोषण के शिकार हैं और हम चले दुनिया की महाशक्ति बनने। अमीर गरीब के बीच बढ़ती खाईं परेशान करने वाली। देश मे बेरोजगारों की भींड दुखद। अब तज सरकारों ने खूब लंबी चौड़ी बातें की। क्या सरकारें सोचती हैं कि बातों और दावों से लोगों का भला हो जाएगा या सोचती हैं कि लोगों का भला हो जाएगा तो हमारी दुकान कैसे चलेगी। अब तक की सरकारों के दावों और वादों को देखें तो हकीकत से कोसों दूर हैं। देश में कुछ नहीं बदल रहा। लोगों का ध्यान मूल मुद्दों और समस्याओं से हटाकर एजेंडा सेटिंग कर दी जाती है। मीडिया(अधिकतर tv channel) भी हनीप्रीत, राधे माँ जैसे मसालेदार सामग्री में खोया है। गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, किसान या भुखमरी जैसे मुद्दों पर कभी चर्चा हुई क्या ? होगी भी नहीं।
सब अपनी अपनी डफली अपना अपना राग अलाप रहे हैं जनता बस एक वोट बैंक बन कर रह गई है।
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