Thursday, 25 August 2016

जानें रियो ओलंपिक में क्यों पड़ा पदकों का अकाल....

  • रियो ओलंपिक से भारतीय टीम की वापसी के बाद सबके मन में यह सवाल उठ रहा होगा की आखिर ओलंपिक में भारत के लिए पदकों का अकाल क्यों पड़ गया साक्षी मालिक और पी.वी.सिन्धु की सफलता के बीच हमे यह नहीं भूलना चाहिए की हमारे देश की आबादी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है मेडल का अकाल एक बार की पीड़ा नहीं है,हर बार स्थिति यही होती है हम मंगल पर अपना यान भेजकर,ब्रम्होस मिसाइल का परीक्षण कर ,अपनी अर्थव्यवस्था के विकास को लेकर अपने आप को अमेरिका ,रूस ,ब्रिटेन ,चीन आदि देशो के क्लब में शामिल होने का दावा तो करते है लेकिन हम इस सवाल का जवाब क्यों नहीं खोज पाते कि हम खेल में इतने पीछे क्यों ? हम इस बात की पड़ताल के लिए खेल की जमीनी हकीकत जानेंगे हमारा देश दुनिया के सबसे अनफिट देशों में गिना जाता है सबसे बड़ी पीड़ा की बात यह है कि जिन बच्चों के कंधो पर देश का भविष्य है उनमे से लगभग आधे बच्चे कुपोषण के शिकार हैं आज से 10 साल पहले अधिकांश स्कूलों में खेल का एक घंटा निर्धारित होता था जिसमे बच्चे खेलते –कूदते थे जिससे उनका शारीरिक एवं मानसिक विकास होता था आज के दौर में दुकानों की भांति स्कूल खूल गये हैं उन स्कूलों में खेल के मैदान केवल कागजों पर ही विद्यमान होते हैं आज के बच्चे खेल के मैदान में खेलने की अपेक्षा मोबाइल या कंप्यूटर पर गेम खेलने में ज्यादा रूचि लेते हैं हमारे यहाँ ज्यादातर लोग अब भी पुरानी कहावत पढोगे लिखोगे बनोगे नवाब खेलोगे कूदोगे होगे ख़राब की जंजीरों में जकड़े हुए है हम अपने देश से पदक की उम्मीद तो करते हैं लेकिन देश के ज्यादातर लोग अपने बच्चों को खेलने देना नहीं चाहते देश के खिलाडियों को सरकार उचित संसाधन नहीं दे पा रही जिससे खिलाड़ी बेहतर अभ्यास  नहीं कर पाते खेलों में  भारत की दुर्दशा  के लिए देश की  गरीबी भी जिम्मेदार है। गरीबी के कारण महंगे संसाधनों वाले खेल खेलना मुश्किल हो जाता है फिर चाहे भारत के खिलाडियों में  कितनी ही प्रतिभा क्यों न हो।हालाँकि तमाम परेशानियों और बाधाओं को पार कर सिन्धु ,साक्षी ने देश का मान बढाया   हमारे देश में लोग आज भी  लड़िकयों को लेकर प्रगतिवादी सोच नहीं रखते। गांवों की लड़िकयों को खेलों में  आगे बढ़ने के मौके नहीं मिल पाते भारत के इस प्रदर्शन के लिए एक कारण क्रिकेट भी है देश में क्रिकेट को जो स्थान प्राप्त है वह किसी और खेल को नहीं मानव संसाधन विकास मंत्रालय की एक स्टैंडिंग कमेंटी की रिपोर्ट में सामने आया कि भारत में केंद्र और राज्य सरकार मिलकर एक एथलीट पर प्रतिदिन 3 पैसे खर्च करती हैं जबिक अमेरिका अपने हर खिलाडी पर एक दिन में 22 रूपये  खर्च करता है। इसी तरह इंग्लैंड  रोज़ 50 पैसे अपने हर खिलाडी पर खर्च  करता है और जमैका जैसा देश भी अपने खिलाडियों पर 19 पैसे प्रतिदिन खर्च करता है भारत में ज्यादातर अभिभावक करियर के रूप में खेल को नहीं देखते हमारे देश में आपको गली और मुहल्लों में धार्मिक स्थल तो आसानी से नजर आ जायेंगे लेकिन लाखों की आबादी पर शायद ही कही स्टेडियम नजर आये देश में खिलाडियों को प्रशिक्षित करने के लिए अच्छे कोचों की भरी कमी है आने वाले समय में देश को पदकों की संख्या में इजाफा करना है तो सही नीति और नियत से प्रयास करना होगा खेल को प्रोत्साहन देने के साथ ही 8 वीं तक अनिवार्य विषय के रुप में शामिल कर देना चाहिए आने वाले समय में इंटरनेशनल बेइज्ज्ती से बचने के लिए अब समय इमानदारी के साथ कुछ करने का है

Sunday, 21 August 2016

सावधान ! सेल्फी से सेल्फाइटिस का खतरा

स्मार्टफोन ने युवापीढ़ी की जिंदगी को ही बदल दिया है ।सेल्फी का क्रेज युवाओं के सर चढ़कर बोल रहा है सेल्फी शब्द लोगों की जुबान पर ऐसे चढ़ा की उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है 2013 में तो इसे ऑक्सफोर्ड वर्ड ऑफ़ द ईयर बना दिया गया एक अनुमान के मुताबिक पिछले सालों के मुकाबले इसका प्रयोग 1700 गुना ज्यादा बार किया गया । बाइक या स्कूटी चलाते हुए,नदियों की लहरों पर नौकाविहार के दौरान,चलती ट्रेन ,आटो,बस आदि से यात्रा के वक्त किसी उंची इमारत पर खड़े होकर आदि तरीकों से सेल्फी लेना( मोबाइल से खुद की फोटो लेना ) आज के युवाओं का पसंदीदा शौक  बनता जा रहा है। एक नए अध्ययन में यह बात सामने आयी है कि लड़कियां एक हफ्ते में पांच घंटे सेल्फी लेने में बिताती हैं अध्ययन में यह पाया गया कि अच्छी सेल्फी लेने में इतना समय मेकअपऔर अच्छे एंगल की तलाश में लगता है ।इतना ही नही दिन भर में कई बार अपनी फोटो को खींचकर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर पोस्ट करना एवं लाइक या कमेंट का इंतजार करना युवाओं की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। लाइक या कमेंट न मिलने या कम मिलने पर उनके अंदर चिड़चिड़ापन या बेचैनी जैसी समस्या पायी जा रही है। अगर आप भी सेल्फीबाज हैं तो सावधान हो जाइये। अमेरिकन एसोसिएशन आफ साइकियाट्रिक ने  सेल्फी की लत को “सेल्फाइटिस” नामक बीमारी घोषित  किया है। सेल्फाइटिस के लक्षणों में बार -बार खुद की ही फोटो खींचना और उसे सोशल साइटस पर पोस्ट करना पीड़ित की मजबूरी सी बन जाती है। ऐसे लोगों के मन में फोटो को लेकर विचारों की बाढ़ सी आ जाती है जैसे ये फोटो ज्यादा अच्छा नही है दूसरा खींचते हैं,मेरे फोटो पर लाइक और कमेंट कम मिले क्यों आदि जैसे तमाम सवाल व्यक्ति के मन में आते रहते हैं और उसके स्वभाव मे व्याकुलता एवं चिड़चिड़ापन पैदा कर देते हैं। कुछ तो मामले ऐसे भी सामने आये जिसमे व्यक्ति शोकाकुल माहैाल में भी खुद को सेल्फी लेने से नही रोक पाये। मनोचिकित्सकों का मानना है कि शोकाकुल माहौल में सेल्फी लेना एक असभ्य एवं संवेदनहीन व्यवहार है। अभी कुछ दिनों पहले मुम्बई पुलिस ने 16 जगहों को "नो सेल्फी जोन "घोषित किया है यह कदम सेल्फी लेने के दौरान कई लोगों की मौत हो जाने के कारण उठाया गया है । दुनिया में 2015 में सेल्फी की वजह से कुल 27 मौतों में से 15 मौतें अकेले भारत में हुई ।कुछ शोधों  में यह भी पता चला है है की स्क्रीन की नीली रोशनी त्वचा को नुकसान पहुँचा  सकती है ।अगर आप भी ऐसी आदत के शिकार हैं तो सावधान
हो जाइये क्योंकि आप भी अनजाने में सेल्फाइटिस जैसे मानसिक रोग की गिरफ्त में आ रहे हैं । किशोरों एवं युवाओं में यह मनोरोग तेजी से पांव पसार रहा है।

Saturday, 13 August 2016

आजादी का सफरनामा-गांधी से मोदी तक.....




स्वतंत्रता दिवस आने वाला है। यह जो आजादी हमें मिली उसके पीछे लम्बे संघर्षों और कुर्बानियों की कहानी हंै। फ्रांस के महान दार्शनिक रूसो ने बड़े दुख के साथ लिखा था कि ’मनुष्य तो स्वतंत्र पैदा हुआ है,किंतु वह सर्वत्र बंधनो में जकड़ा हुआ है।’रूसो का यह कथन फ्रांस की क्रांति का नेतृत्व वाक्य बना और 1779 में फ्रांस राजशाही से मुक्त हो गया। इसके बाद पुरी दुनिया में स्वतंत्रता की एक लहर चलनी शुरू हो गयी। भारत तक इस लहर को पहुंचने में लगभग डेढ़ सौ साल लग गये और 1947 में भारत को आजादी मिली। आजादी के लिए भारत माता के लाखों वीर सपूतों ने अपनी कुर्बानियां दी। कितनों से पिता का साया छिन गया, किसी की मांग सुनी हो गयी तो किसी के घर का चिराग बुझ गया। आजादी मिलने के बाद गांधी जी ने एक तरफ जहां कोई पद लेने से इंकार कर दिया वहीं आज मोदी जी स्वयं को प्रधानमंत्री नही प्रधान सेवक कहते हैं। अभी हम 70 वां स्वतंत्रता दिवस मनाने वाले हैं कुछ लोग आजादी का अर्थ अपनी मनमर्जी करने से निकालते है लेकिन ऐसा नही है हमारी स्वतंत्रता वहीं तक है जहां तक किसी और की स्वतंत्रता प्रभवित न हो। संविधान मे हमें जहां एक तरफ कई तरह की स्वतंत्रता दी गयी है वहीं दुसरी तरफ उस पर युक्तियुक्त प्रतिबंध भी लगाया गया है। इसलिए हमें स्वतंत्रता का उपयोग मनमर्जी करने में नही बल्कि स्वयं के विकास और देशहित में करना चाहिए। पिछले कुछ समय से चन्द मुठ्ठी भर लोग अपनी स्वतंत्रता का दुरूपयोग करके देश की एकता एवं अखण्डता को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते रहे हैं जो किसी भी कीमत पर बर्दास्त करने योग्य नही है। भारत की वर्तमान पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी को आजादी की कीमत समझनी होगी। भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। युवाओं की शक्ति का सही उपयोग करने के लिए उन्हे उचित प्लेटफार्म और सही मार्गदर्शन देने की जरूरत है। भारत एक ऐसा देश है जिसकी पहचान अनेकता में एकता की हैै। यह शान्ति तथा वसुधैव कुटुम्बम के सुत्र में विश्वास करता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद तीसरी पीढ़ी जवान हो रही है लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या इसके लिए भी आजादी कीमत वहीं है जो उस दौर के लोगों के लिए थी। मुझे लगता है शायद नही। उस दौर के लोगांे में भारत माता की जय बोलने पर एक अजीब सी उर्जा का संचार होता था और वे अपने देश के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे। लोग तिरंगे को हाथ में लेकर गोलियों से छलनी हो जाते फिर भी मरते दम तक उसे जमीन पर गिरने नही देते,एक लुढ़कता तब तक दुसरा थाम लेता। आज के समय में कुछ लोग ऐसे हैं जिनको भारत माता की जय कहने शर्म आती है। कुछ लोग हमारे तिरंगे को जलाते है,पाकिस्तानी झण्डा फहराते हैं और भारत की बर्बादी के नारे लगाते हैं। मैं समझता हुं कि इनको कड़ा सबक सिखाने की जरूरत है। यहां मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हुं कि मुझे भारतीयों की देशभक्ति पर कोई शक नही है। देश के कुछ गद्दार राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं। गांधी जी ने देश को आजादी दिलाने के लिए सत्य और अहिंसा को अपना हथियार बनाया और आजादी मिलने तक अनवरत अपना संघर्ष जारी रखा। यहां गाांधी जी की बात कर मैं और लोगों के आजादी में दिये योगदान की उपेछा नही करना चाहता सभी का योगदान अतुल्य है लेकिन गांधी जी इस स्वतंत्रता आन्दोलन के सूत्रधार रहे। आजादी के 70 साल पुरे होने को हैं प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत अन्तराष्ट्रीय मंच पर नित्य नई उंचाईयां छू रहा है हां भारत को यहां तक लाने में पिछली सरकारों के भी महत्वपूर्ण योगदान हैं। आज मादीे सरकार जो इमारत बना रही है उसकी नींव भरने का काम पिछली सरकारों ने ही किया है। गाांधी से लेकर मोदी तक के इस 70 साल के सफरनामे में देश ने कई उतार-चढ़ाव देखे। जहां एक तरफ आज 21 वीं सदी में देश तमाम बाधाओं और आशंकाओं को दूर करते हुए दुनिया की सबसे तेज गति से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था बन चुका है और दुनिया मंे एक ताकतवर देश के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर रहा है। वहीें दुसरी तरफ गरीबी,बेरोजगारी और कुपोषण जैसे अभिषापांे से देश पुरी तरह से निपटने में असमर्थ रहा है। कुल मिलाकर पुरी दुनिया यह मानती है कि 21 वीं सदी एशिया की है खासतौर से भारत और चीन की। पूरी दुनिया भारत की तरफ देख रही है भारत के लिए पुरा मौका है बस जरूरत है तो सही नीति और नियत की।  

मेरे पास सुषमा हैं .....

दूसरे देशों में फंसे भारतीयों के लिए मेादी सरकार में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ‘तारणहार‘ की भूमिका निभा रही हैं। पहले यमन, लीबिया, दक्षिणी सूडान में फंसे भारतीयों को सुरक्षित निकालने के त्वरित
प्रयास कीे देश-विदेश में खूब सराहना हूई। पाकिस्तान से गीता की स्वदेश वापसी हो या अब सऊदी अरब में फंसे दस हजार भारतीयों के खाने-पीने की व्यवस्था से लेकर स्वदेश वापसी के इंतजामों को लेकर वह चर्चा में रही हैं। सुषमा भारतीयों की छोटी से छोटी समस्याओं को हल करने में भी संकोच नही करतीं। उनके ट्वीट एवं टिप्पणीयां काफी जिम्मेदारीपूर्ण होती हैं। कई मामले ऐसे भी आए जब उन्होनें पीड़ितों तक कुछ ही घंटों मंे मदद पहुंचाई। सोशल मीडिया पर लगातार एक्टिव रहना, टैग की गयी हर चीज पर नजर रखना और हाजिरजवाबी सुषमा को दूसरे नेताओं से अलग करती है। विदेश मंत्री ने अभी तीन दिन पहले एक व्यक्ति की कार क्षतिग्रस्त होने की शिकायत पर उसकी मदद की, उन्होने पत्नी का पासपोर्ट न बन पाने के कारण अकेले हनीमून पर गये नवविवाहित की मदद करने में भी जरा देर नही लगायी। मैं समझता हूं कि यह देश के इतिहास में पहली बार हो रहा है।इसलिए प्रत्येक भारतीय यह गर्व से कह सकता है कि मेरे पास सुषमा हैं चाहे कोई सात समुन्दर पार हो या पास पडोस  उसकी मदद के लिए भारतीय विदेश मंत्री हमेशा तैयार रहती हैं