सपा में मचा घमासान अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव के निलंबन रदद होने के बाद थमता नजर आ रहा है लेकिन कुछ सूत्रों का दावा है कि अखिलेश यादव को सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा सकता है।
Saturday, 31 December 2016
सपा के दंगल में जीते अखिलेश...
समाजवादी पार्टी के दंगल में जीते अखिलेश यादव। सपा को मिला एक नया पहलवान,अखिलेश ने मनवाया अपना लोहा मुलायम हुए मजबूर मानी अखिलेश की बात। अखिलेश और रामगोपाल का निष्कासन रदद आज़म खान बने सूत्रधार।
Friday, 30 December 2016
आखिर कलयुग में दुबारा लिख दी गई रामायण....
शुक्रवार को जो हुआ, इसकी पटकथा तो कई महीने पहले लिखनी शुरू हो गयी थी, वर्ष 2012 में जब सपा भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई थी तो उस समय खुद सपा के नेताओं को भी इतनी बड़ी जीत की उम्मीद नहीं थी, राजनीति के माहिर खिलाडी मुलायम सिंह यादव ने जब इसका मंथन किया तो पाया कि इसमें उनके टीपू का बड़ा योगदान है, उस समय बाहुबलियों को साथ लेकर सत्ता पाने का प्रयास करने वाले मुलायम सिंह यादव और उनके भाई शिवपाल यादव ने जब एक बड़े बाहुबली डी.पी.यादव को पार्टी में शामिल करने का प्रयास किया तो इसी पढ़े-लिखे टीपू ने उसका खुलकर विरोध कर दिया,उस समय मुलायम-शिवपाल को टीपू का ये फैसला बचकाना सा लगा था पर जैसे ही चुनावी परिणाम आये और जनता ने उम्मीद से ज्यादा वोट देकर सपा की झोली भर दी तो मुलायम को समझ में आ गया कि ये बदले दौर की राजनीति है, अब गुंडागर्दी और माफियागर्दी वाली राजनीति को जनता पसंद नहीं करती और टीपू ने जो नयी चिंगारी शुरू की है ,वो ही राजनीति की नयी दिशा होगी।
राजनीति के धुरंधर मुलायम इसे समझ गए और उन्होंने उस समय ही अपने स्थान पर अपने बेटे को मुख्यमंत्री की गद्दी सौंप दी,मुलायम के इस फैसले ने उनके चाचा शिवपाल को अन्दर से हिला दिया,वे तो ये मानते थे कि मुलायम के बाद वे ही उनके असली उत्तराधिकारी होंगे,क्योंकि उनकी भी राजनीति का तरीका ऐसा ही था जैसा पहलवान मुलायम को अच्छा लगता था और वो टीपू,जो कहीं अपना परिचय भी मुलायम जैसी बड़ी हस्ती के बेटे के रूप में नहीं देता था और चुप-चुप सा रहता था ,वो तो मुलायम की राजनीति का उत्तराधिकारी हो ही नहीं सकता,शिवपाल के साथ ही कलयुग की कैकेयी साधना गुप्ता को भी लगा कि मुलायम ने अगर टीपू का राजतिलक कर दिया तो उनका और उनके बेटे प्रतीक का भविष्य क्या होगा..?..साधना और शिवपाल को एक ऐसे व्यक्ति का भी साथ मिल गया, जो जिस घर में बैठा,उस घर में सगे भाइयों को भी दुश्मन बना देने का हुनर जानता है और समाजवादी मुलायम को कॉर्पोरेट कल्चर वाला मुलायम बनाने वाले अमर सिंह भी इस मामले में शामिल हो गए,उस समय तो कोई मुलायम को इस बात के लिए तैयार नहीं कर पाया कि वे टीपू को गद्दी न सौंपे, वैसे भी भारतीय संस्कृति में पिता का असली वारिस बेटा ही माना जाता है ,दूसरी पत्नी के साथ आया उसके पहले पति का बेटा नहीं,ऐसे में उस समय तो ये टीपू के राजतिलक को रोक नहीं पाए थे, पर पटकथा लिखनी उसी समय शुरू हो गयी थी,जो अब लिखकर पूरी हुई है।
कल शनिवार को सुबह पिता-पुत्र में कौन ताकतवर होगा इस का खुलासा हो जायेगा,लेकिन जो अभी तक के हालात है,उनके अनुसार इस बार इस बार दशरथ को अपने दबाव में लेने वाली कैकेयी और उनके ‘ मंथरा’ अपने मकसद में सफल नहीं हो पाएंगे क्योंकि त्रेता हो या कलयुग ,जनता को जो कहना होता है वो खुलकर कह ही देती है और इस बार तो वो चिल्ला-चिल्लाकर कह रही है कि दशरथ जी ..राम को बनवास मत दो,राजनीति को अब गुंडों और माफियाओं की ज़रुरत नहीं है बल्कि अब तो उसे ही देश प्रदेश में मौका दिया जायेगा,जो विकास और सफाई की बात करेगा।
मुख्यमंत्री आवास पर 3 युवकों ने की आत्मदाह करने की कोशिश
समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव द्वारा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और राष्ट्रीय महासचिव प्रो.रामगोपाल यादव को पार्टी से 6 वर्ष से निकाले जाने के बाद उग्र अखिलेश समर्थकों ने सीएम आवास और मुलायम आवास के बाहर जमकर प्रदर्शन और नारेबाजी की। तीन समर्थकों ने मुख्यमंत्री आवास के बाहर आत्मदाह की भी कोशिश की, लेकिन पुलिस ने सजगता से उन्हें पकड़ लिया। वहीं प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव के आवास के बाहर भी उनके समर्थकों ने प्रदर्शन किया। सपा मुुखिया के फैसले की जानकारी जैसे ही अखिलेश समर्थकों और कार्यकर्ताओं को मिली, उनका हुजूम मौके पर उमड़ पड़ा। इस दौरान कार्यकर्ताओं ने सीएम आवास के बाहर भीड़ नियंत्रित करने के लिए लगायी गयी बैरीकैडिंग पर भी चढ़ने की कोशिश की और शिवपाल यादव सहित राष्ट्रीय महासचिव अमर सिंह को पार्टी से तुरन्त निकालने जाने की मांग की। कई कार्यकर्ताओं ने सड़क पर बैठकर भी अपना विरोध जताया।
वहीं कुछ लोगों ने मुलायम और शिवपाल के पोस्टर जलाकर भी अपनी नाराजगी का इजहार किया है। इसके अलावा तीन लोगों ने कैरोसिन डालकर आत्मदाह करने की भी कोशिश की, लेकिन पुलिस ने तत्काल उन्हें रोक कर मौके से हटाया। सूबे के इस सबसे बड़े सियासी घटनाक्रम के बाद अखिलेश समर्थक विधायक और मंत्रियों का भी उनके आवास पर पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। मौके पर तनावपूर्ण हालात को देखते हुए राजधानी के कई थानों की पुलिस को मुख्यमंत्री आवास के आस-पास तैनात कर दिया गया। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सपा में आये इस भूचाल ने पार्टी को जहां सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है, वहीं समर्थक भी अलग-अलग गुटो में बंट गए हैं और अपने-अपने नेताओं के पक्ष में प्रदर्शन और नारेबाजी कर रहे हैं।
सपा में दो फाड़ होने के बाद देखिये सोशल मीडिया पर लोगों की कैसी कैसी प्रतिक्रियाएं आ रही है
सपा से अखिलेश और रामगोपाल के निष्कासन के बाद सोशल मीडिया पर तरह तरह के कॉमेंट आ रहे हैं कोई मुलायम को राष्ट्रपति पड़ का उम्मीदवार बता रहा है तो कोई कह रहा है अखिलेश बीजेपी ज्वाइन करने जा रहे हैं, किसी ने तो अखिलेश का चुनाव चिन्ह मोटरसाइकिल भी चुन ली है।
नोटबंदी पर अनपढ़ विद्वानों की चर्चा
अगर आप ट्रेन से सफर कर रहे हैं और आप अकेले हों तो सफर काफी उबाउं लगता है ऐसा मैंने अनुभव किया है। नोटेबन्दी 2016 का सबसे चर्चित मुद्दा रहा और इसका असर काफी व्यापक और दीर्घकालीन होने वाला है।ट्रेन में सफर करने के दौरान कुछ लोग नोटेबन्दी पर चर्चा छेड़ देते हैं। कुछ लोग पक्ष में तो कुछ विपक्ष में लगे तर्क देने। दोनों पक्ष के लोग अपने विचार और तर्क को सही ठहराने के लिए कुतर्क देने से भी बाज नहीं आ रहे थे तर्क और कुतर्क भी ऐसे की उनके शिक्षित होने पर भी संदेह हो रहा था एक सज्जन का कुतर्क था मोदी चोर है तभी उसने नोटबंदी कर दी चोर ही चोरी का हाल जानता है कहावत मारकर उन्होंने अपनी बात को सिद्ध करने की कोशिश की एक और आदमी बोला मोदी ने नोटबंदी से पहले अपना और पार्टी का कालाधन सफ़ेद कर दिया। दूसरे पक्ष के सज्जन ने कहा मोदी ने नोटबंदी कर अच्छा किया अबतक जितने नेता हुये ओ डरते थे उन्हें देश नही वोट की चिंता थी। तभी एक सज्जन बोले नोबंदी से गरीब और किसान परेशान हुए अमीरों को तो कुछ नहीं हुआ। लोगों के विचार मैं काफी ध्यान से सुन रहा था विद्वानों की बहस में शामिल होना उचित नहीं समझा। हमारे पास ही बैठे एक नवयुवक ने कुछ कहने की कोशिश की तो उन स्वकथित विद्वानों ने कहा "बेटा जब दो बड़े बात करें तो छोटो को नही बोलना चाहिए। मैं तो मन ही मन मुस्कुरा रहा था,करता भी क्या बड़ों की संस्कारशाला और तानाशाही के आगे लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बौनी पड़ गयी और चंद लोगों ने मुकदमा चला कर फैसला सुना डाला किसी ने मोदी को दोषी माना तो किसी ने देशभक्त और नायक।