Friday, 30 December 2016

आखिर कलयुग में दुबारा लिख दी गई रामायण....

शुक्रवार को जो हुआ, इसकी पटकथा तो कई महीने पहले लिखनी शुरू हो गयी थी, वर्ष 2012 में जब सपा भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई थी तो उस समय खुद सपा के नेताओं को भी इतनी बड़ी जीत की उम्मीद नहीं थी, राजनीति के माहिर खिलाडी मुलायम सिंह यादव ने जब इसका मंथन किया तो पाया कि इसमें उनके टीपू का बड़ा योगदान है, उस समय बाहुबलियों को साथ लेकर सत्ता पाने का प्रयास करने वाले मुलायम सिंह यादव और उनके भाई शिवपाल यादव ने जब एक बड़े बाहुबली डी.पी.यादव को पार्टी में शामिल करने का प्रयास किया तो इसी पढ़े-लिखे टीपू ने उसका खुलकर विरोध कर दिया,उस समय मुलायम-शिवपाल को टीपू का ये फैसला बचकाना सा लगा था पर जैसे ही चुनावी परिणाम आये और जनता ने उम्मीद से ज्यादा वोट देकर सपा की झोली भर दी तो मुलायम को समझ में आ गया कि ये बदले दौर की राजनीति है, अब गुंडागर्दी और माफियागर्दी वाली राजनीति को जनता पसंद नहीं करती और टीपू ने जो नयी चिंगारी शुरू की है ,वो ही राजनीति की नयी दिशा होगी।
राजनीति के धुरंधर मुलायम इसे समझ गए और उन्होंने उस समय ही अपने स्थान पर अपने बेटे को मुख्यमंत्री की गद्दी सौंप दी,मुलायम के इस फैसले ने उनके चाचा शिवपाल को अन्दर से हिला दिया,वे तो ये मानते थे कि मुलायम के बाद वे ही उनके असली उत्तराधिकारी होंगे,क्योंकि उनकी भी राजनीति का तरीका ऐसा ही था जैसा पहलवान मुलायम को अच्छा लगता था और वो टीपू,जो कहीं अपना परिचय भी मुलायम जैसी बड़ी हस्ती के बेटे के रूप में नहीं देता था और चुप-चुप सा रहता था ,वो तो मुलायम की राजनीति का उत्तराधिकारी हो ही नहीं सकता,शिवपाल के साथ ही कलयुग की कैकेयी साधना गुप्ता को भी लगा कि मुलायम ने अगर टीपू का राजतिलक कर दिया तो उनका और उनके बेटे प्रतीक का भविष्य क्या होगा..?..साधना और शिवपाल को एक ऐसे व्यक्ति का भी साथ मिल गया, जो जिस घर में बैठा,उस घर में सगे भाइयों को भी दुश्मन बना देने का हुनर जानता है और समाजवादी मुलायम को कॉर्पोरेट कल्चर वाला मुलायम बनाने वाले अमर सिंह भी इस मामले में शामिल हो गए,उस समय तो कोई मुलायम को इस बात के लिए तैयार नहीं कर पाया कि वे टीपू को गद्दी न सौंपे, वैसे भी भारतीय संस्कृति में पिता का असली वारिस बेटा ही माना जाता है ,दूसरी पत्नी के साथ आया उसके पहले पति का बेटा नहीं,ऐसे में उस समय तो ये टीपू के राजतिलक को रोक नहीं पाए थे, पर पटकथा लिखनी उसी समय शुरू हो गयी थी,जो अब लिखकर पूरी हुई है।
कल शनिवार को सुबह पिता-पुत्र में कौन ताकतवर होगा इस का खुलासा हो जायेगा,लेकिन जो अभी तक के हालात है,उनके अनुसार इस बार इस बार दशरथ को अपने दबाव में लेने वाली कैकेयी और उनके ‘ मंथरा’ अपने मकसद में सफल नहीं हो पाएंगे क्योंकि त्रेता हो या कलयुग ,जनता को जो कहना होता है वो खुलकर कह ही देती है और इस बार तो वो चिल्ला-चिल्लाकर कह रही है कि दशरथ जी ..राम को बनवास मत दो,राजनीति को अब गुंडों और माफियाओं की ज़रुरत नहीं है बल्कि अब तो उसे ही देश प्रदेश में मौका दिया जायेगा,जो विकास और सफाई की बात करेगा।

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