Friday, 30 December 2016

नोटबंदी पर अनपढ़ विद्वानों की चर्चा

अगर आप ट्रेन से सफर कर रहे हैं और आप अकेले हों तो सफर काफी उबाउं लगता है ऐसा मैंने अनुभव किया है। नोटेबन्दी 2016 का सबसे चर्चित मुद्दा रहा और इसका असर काफी व्यापक और दीर्घकालीन होने वाला है।ट्रेन में सफर करने के दौरान कुछ लोग नोटेबन्दी पर चर्चा छेड़ देते हैं। कुछ लोग पक्ष में तो कुछ विपक्ष में लगे तर्क देने। दोनों पक्ष के लोग अपने विचार और तर्क को सही ठहराने के लिए कुतर्क देने से भी बाज नहीं आ रहे थे तर्क और कुतर्क भी ऐसे की उनके शिक्षित होने पर भी संदेह हो रहा था एक सज्जन का कुतर्क था मोदी चोर है तभी उसने नोटबंदी कर दी चोर ही चोरी का हाल जानता है कहावत मारकर उन्होंने अपनी बात को सिद्ध करने की कोशिश की एक और आदमी बोला मोदी ने नोटबंदी से पहले अपना और पार्टी का कालाधन सफ़ेद कर दिया। दूसरे पक्ष के सज्जन ने कहा मोदी ने नोटबंदी कर अच्छा किया अबतक जितने नेता हुये ओ डरते थे उन्हें देश नही वोट की चिंता थी। तभी एक सज्जन बोले नोबंदी से गरीब और किसान परेशान हुए अमीरों को तो कुछ नहीं हुआ। लोगों के विचार मैं काफी ध्यान से सुन रहा था विद्वानों की बहस में शामिल होना उचित नहीं समझा। हमारे पास ही बैठे एक नवयुवक ने कुछ कहने की कोशिश की तो उन स्वकथित विद्वानों ने कहा "बेटा जब दो बड़े बात करें तो छोटो को नही बोलना चाहिए। मैं तो मन ही मन मुस्कुरा रहा था,करता भी क्या बड़ों की संस्कारशाला और तानाशाही के आगे लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बौनी पड़ गयी और चंद लोगों ने मुकदमा चला कर फैसला सुना डाला किसी ने मोदी को दोषी माना तो किसी ने देशभक्त और नायक।

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