अखिलेश यादव ने 2012 विधानसभा चुनाव मे डीपी यादव के मुद्दे पर जिस तरह से लोगों के बीच अपनी छवि बनायीं और लोगों का भरोसा जीता ठीक उसी तरह इस बार भी मुख़्तार अंसारी को पार्टी में शामिल न करने की हठधर्मिता ने भी अखिलेश की छवि को धार दे दी है। दरअसल सपा के पूरे पारिवारिक विवाद की जड़ में ही कौमी एकता दल का विलय और मुख़्तार अंसारी ही थे। मुख्तार एवं उनकी पार्टी का जिस पुरजोर तरीके से अखिलेश ने विरोध किया, उससे ऐसे लोग जो राजनीति का अपराधिकरण नहीं चाहते, वे लोग भी अपनी तमाम आस्थाओं को छोड़ कर समाजवादी पार्टी के पक्ष मे मतदान करेंगे। इसलिए इसका प्रभाव सिर्फ एक सीट पर ही नहीँ बल्कि कई जिलों मे होगा। मुख़्तार के बसपा में जाने से कितना लाभ होगा यह तो समय ही बताएगा लेकिन गुंडों से दुरी बनाने वाली मायावती अब सत्ता का सुख भोगने के लिए गुड गुंडा और बैड गुंडा की श्रेणी बना दी है। जो कुछ भी हो लेकिन किसी दल को अपराधीकरण करने और गुंडाराज को बढ़ावा देने का कोई अधिकार नही है। वोटरों को चाहिए की वह अपने वोट की चोट से एक स्वस्थ सरकार और लोकतंत्र का निर्माण करें।
Thursday, 26 January 2017
क्या डीपी यादव की तरह ही मिलेगा मुख़्तार से दूरी का लाभ...
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