Sunday, 19 March 2017

20 मार्च विश्व गौरैया दिवस : गायब होती गौरैया

प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को विश्व गौरेया दिवस मनाया जाता है इसकी शुरुआत 2010 में प्रसिद्ध पर्यावरणविंद मो. ईदिलावर के प्रयासों से हुई थी। एक समय था जिस आंगन में नन्ही गौरैया की चहल कदमी होती थी आज वह आंगन सूने पड़े हुए हैं। आधुनिक पक्के मकान, बढ़ता प्रदुषण, जीवन शैली में बदलाव के कारण गौरैया लुप्त हो रही है दस-बीस साल पहले तक गौरेया के झुंड सार्वजनिक स्थलों पर देखे जा सकते थे। लेकिन खुद को परिस्थितियों के अनुकूल न बना पाने के कारण यह चिड़िया अब भारत,यूरोप सहित दुनिया के कई बड़े हिस्सों से विलुप्त होने के कगार पर है। घर-आंगन में फुदकने-चहकने वाली गौरैया अब ढूंढे नहीं मिलती। आज गौरैया अपने अस्तित्व के लिए मनुष्य और अपने वातावरण के बीच जद्दोजहद कर रही है। कम होती हरियाली और घरों के आसपास बने विषाक्त वातावरण ने गौरैया को गायब ही कर दिया है। गौरैया जो हमारे घरों के भीतर-बाहर हमेशा मौजूद रही उसकी चहक और फ़ंखों की फ़ड़फ़ड़ाहट हमारे जहन में आज भी है। लेकिन आज न तो सुबह-सुबह उसकी चहक सुनाई देती है और न घर के आंगन में बिखरे अनाज के दाने को चोच में दबाकर उड़ने की आवाज। आज गौरैया के गायब होने के पीछें कई कारण हैं और उनके जिम्मेदार भी मानव जाति ही है। मनुष्य ने स्वार्थवश प्रकृति का खूब दोहन किया और इसका खामियाजा ये हुआ कि हम प्रकृति के वरदानों से भी भी दूर होते चले और इसके दुष्परिणाम भी हमारे सामने है। गौरैया की घटती संख्या के पीछे भोजन और जल की कमी, घोसलों के लिए उचित स्थानों की कमी तथा तेज़ी से कटते पेड़ - पौधे,अत्यधिक रसायनों का प्रयोग वातावरण में बदलाव आदि कई कारण हैं। गौरैया की कमी तो सबने महसूस की है लेकिन गौरैया को बचाने के लिए बहुत कम लोग आगे आए हैं इस चिड़िया को बचाने के लिए धरातलीय स्तर पर जागरुकता नहीं दिखती है। गौरैया को संरक्षित करने के लिए शहरों और ग्रामीण इलाकों में घोसलों के लिए सुरक्षित जगह बनानी होगी। उन्हें प्राकृतिक वातावरण देना होगा। घरों के आसपास आधुनिक घोंसले बनाएं जाएं। वैसे विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी संगठनों ने गौरैया के संरक्षण के लिए अभियान चलाया है पिछले साल यूपी सरकार ने स्कूली बच्चों में गौरैया के प्रति जानकारी उपलब्ध कराने के लिए जागरुकता अभियान चलाया है और विभिन्न स्थानों पर घोषले भी टंगवाये गये।

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