Tuesday, 14 March 2017

किताबों से गायब हुए किसान...सरकार भी हुई बेदर्द

भारत देश गांवों का देश है यहां की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित मानी जाती है। यहां की अधिकतर जनसँख्या कृषि के सहारे अपना भरण पोषण करती है।।मैंने बचपन में एक कविता पढ़ी थी ...
“नहीं हुआ है अभी सवेरा पूरब की लाली पहचान
चिड़ियों के जगने से पहले खाट छोड़ उठ गया किसान"
आज पाठ्यक्रम से खेत किसान चिड़िया सब गायब हो गई हैं…कहाँ हैं …झूरी के दो बैल ….वे हीरा मोती …मीडिया की कवरेज भी किसान और कृषि पर न के बराबर है। ऐसे में किसान की अथक परिश्रम ,कृषि प्रधान देश के रूप में देश की पहचान का संकट स्वाभाविक है। किसानों की महत्ता और योगदान को समझते हुए कभी भारत के प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा दिया था इसका मतलब था किसानों का विकास होगा तो देश का विकास होगा देश आत्मनिर्भर बनेगा।आज के समय में देखें तो खेती किसानी से युवा पीढ़ी दूर हो रही है और बड़े महाबगरों की ओर पलायन कर रही हैं इसका मुख्य कारण है लागत और श्रम के हिसाब से मुनाफा न मिलना। आज देश का अन्नदाता किसान आत्महत्या कर रहा है सरकारें सो रही हैं कई बार कोर्ट की कड़ी फटकार के वावजूद किसानों की आत्महत्या रोकने के लिए सरकार द्वारा उठाये गये कदम नाकाफी साबित हो रहे हैं।

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