Saturday, 31 December 2016

अखिलेश को सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा सकता है

सपा में मचा घमासान अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव के निलंबन रदद होने के बाद थमता नजर आ रहा है लेकिन कुछ सूत्रों का दावा है कि अखिलेश यादव को सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा सकता है।

सपा के दंगल में जीते अखिलेश...

समाजवादी पार्टी के दंगल में जीते अखिलेश यादव। सपा को मिला एक नया पहलवान,अखिलेश ने मनवाया अपना लोहा मुलायम हुए मजबूर मानी अखिलेश की बात। अखिलेश और रामगोपाल का निष्कासन रदद आज़म खान बने सूत्रधार।

Friday, 30 December 2016

आखिर कलयुग में दुबारा लिख दी गई रामायण....

शुक्रवार को जो हुआ, इसकी पटकथा तो कई महीने पहले लिखनी शुरू हो गयी थी, वर्ष 2012 में जब सपा भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई थी तो उस समय खुद सपा के नेताओं को भी इतनी बड़ी जीत की उम्मीद नहीं थी, राजनीति के माहिर खिलाडी मुलायम सिंह यादव ने जब इसका मंथन किया तो पाया कि इसमें उनके टीपू का बड़ा योगदान है, उस समय बाहुबलियों को साथ लेकर सत्ता पाने का प्रयास करने वाले मुलायम सिंह यादव और उनके भाई शिवपाल यादव ने जब एक बड़े बाहुबली डी.पी.यादव को पार्टी में शामिल करने का प्रयास किया तो इसी पढ़े-लिखे टीपू ने उसका खुलकर विरोध कर दिया,उस समय मुलायम-शिवपाल को टीपू का ये फैसला बचकाना सा लगा था पर जैसे ही चुनावी परिणाम आये और जनता ने उम्मीद से ज्यादा वोट देकर सपा की झोली भर दी तो मुलायम को समझ में आ गया कि ये बदले दौर की राजनीति है, अब गुंडागर्दी और माफियागर्दी वाली राजनीति को जनता पसंद नहीं करती और टीपू ने जो नयी चिंगारी शुरू की है ,वो ही राजनीति की नयी दिशा होगी।
राजनीति के धुरंधर मुलायम इसे समझ गए और उन्होंने उस समय ही अपने स्थान पर अपने बेटे को मुख्यमंत्री की गद्दी सौंप दी,मुलायम के इस फैसले ने उनके चाचा शिवपाल को अन्दर से हिला दिया,वे तो ये मानते थे कि मुलायम के बाद वे ही उनके असली उत्तराधिकारी होंगे,क्योंकि उनकी भी राजनीति का तरीका ऐसा ही था जैसा पहलवान मुलायम को अच्छा लगता था और वो टीपू,जो कहीं अपना परिचय भी मुलायम जैसी बड़ी हस्ती के बेटे के रूप में नहीं देता था और चुप-चुप सा रहता था ,वो तो मुलायम की राजनीति का उत्तराधिकारी हो ही नहीं सकता,शिवपाल के साथ ही कलयुग की कैकेयी साधना गुप्ता को भी लगा कि मुलायम ने अगर टीपू का राजतिलक कर दिया तो उनका और उनके बेटे प्रतीक का भविष्य क्या होगा..?..साधना और शिवपाल को एक ऐसे व्यक्ति का भी साथ मिल गया, जो जिस घर में बैठा,उस घर में सगे भाइयों को भी दुश्मन बना देने का हुनर जानता है और समाजवादी मुलायम को कॉर्पोरेट कल्चर वाला मुलायम बनाने वाले अमर सिंह भी इस मामले में शामिल हो गए,उस समय तो कोई मुलायम को इस बात के लिए तैयार नहीं कर पाया कि वे टीपू को गद्दी न सौंपे, वैसे भी भारतीय संस्कृति में पिता का असली वारिस बेटा ही माना जाता है ,दूसरी पत्नी के साथ आया उसके पहले पति का बेटा नहीं,ऐसे में उस समय तो ये टीपू के राजतिलक को रोक नहीं पाए थे, पर पटकथा लिखनी उसी समय शुरू हो गयी थी,जो अब लिखकर पूरी हुई है।
कल शनिवार को सुबह पिता-पुत्र में कौन ताकतवर होगा इस का खुलासा हो जायेगा,लेकिन जो अभी तक के हालात है,उनके अनुसार इस बार इस बार दशरथ को अपने दबाव में लेने वाली कैकेयी और उनके ‘ मंथरा’ अपने मकसद में सफल नहीं हो पाएंगे क्योंकि त्रेता हो या कलयुग ,जनता को जो कहना होता है वो खुलकर कह ही देती है और इस बार तो वो चिल्ला-चिल्लाकर कह रही है कि दशरथ जी ..राम को बनवास मत दो,राजनीति को अब गुंडों और माफियाओं की ज़रुरत नहीं है बल्कि अब तो उसे ही देश प्रदेश में मौका दिया जायेगा,जो विकास और सफाई की बात करेगा।

मुख्यमंत्री आवास पर 3 युवकों ने की आत्मदाह करने की कोशिश

समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव द्वारा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और राष्ट्रीय महासचिव प्रो.रामगोपाल यादव को पार्टी से 6 वर्ष से निकाले जाने के बाद उग्र अखिलेश समर्थकों ने सीएम आवास और मुलायम आवास के बाहर जमकर प्रदर्शन और नारेबाजी की। तीन समर्थकों ने मुख्यमंत्री आवास के बाहर आत्मदाह की भी कोशिश की, लेकिन पुलिस ने सजगता से उन्हें पकड़ लिया। वहीं प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव के आवास के बाहर भी उनके समर्थकों ने प्रदर्शन किया। सपा मुुखिया के फैसले की जानकारी जैसे ही अखिलेश समर्थकों और कार्यकर्ताओं को मिली, उनका हुजूम मौके पर उमड़ पड़ा। इस दौरान कार्यकर्ताओं ने सीएम आवास के बाहर भीड़ नियंत्रित करने के लिए लगायी गयी बैरीकैडिंग पर भी चढ़ने की कोशिश की और शिवपाल यादव सहित राष्ट्रीय महासचिव अमर सिंह को पार्टी से तुरन्त निकालने जाने की मांग की। कई कार्यकर्ताओं ने सड़क पर बैठकर भी अपना विरोध जताया।
वहीं कुछ लोगों ने मुलायम और शिवपाल के पोस्टर जलाकर भी अपनी नाराजगी का इजहार किया है। इसके अलावा तीन लोगों ने कैरोसिन डालकर आत्मदाह करने की भी कोशिश की, लेकिन पुलिस ने तत्काल उन्हें रोक कर मौके से हटाया। सूबे के इस सबसे बड़े सियासी घटनाक्रम के बाद अखिलेश समर्थक विधायक और मंत्रियों का भी उनके आवास पर पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। मौके पर तनावपूर्ण हालात को देखते हुए राजधानी के कई थानों की पुलिस को मुख्यमंत्री आवास के आस-पास तैनात कर दिया गया। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सपा में आये इस भूचाल ने पार्टी को जहां सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है, वहीं समर्थक भी अलग-अलग गुटो में बंट गए हैं और अपने-अपने नेताओं के पक्ष में प्रदर्शन और नारेबाजी कर रहे हैं।

सपा में दो फाड़ होने के बाद देखिये सोशल मीडिया पर लोगों की कैसी कैसी प्रतिक्रियाएं आ रही है

सपा से अखिलेश और रामगोपाल के निष्कासन के बाद सोशल मीडिया पर तरह तरह के कॉमेंट आ रहे हैं कोई मुलायम को राष्ट्रपति पड़ का उम्मीदवार बता रहा है तो कोई कह रहा है अखिलेश बीजेपी ज्वाइन करने जा रहे हैं, किसी ने तो अखिलेश का चुनाव चिन्ह मोटरसाइकिल भी चुन ली है।

नोटबंदी पर अनपढ़ विद्वानों की चर्चा

अगर आप ट्रेन से सफर कर रहे हैं और आप अकेले हों तो सफर काफी उबाउं लगता है ऐसा मैंने अनुभव किया है। नोटेबन्दी 2016 का सबसे चर्चित मुद्दा रहा और इसका असर काफी व्यापक और दीर्घकालीन होने वाला है।ट्रेन में सफर करने के दौरान कुछ लोग नोटेबन्दी पर चर्चा छेड़ देते हैं। कुछ लोग पक्ष में तो कुछ विपक्ष में लगे तर्क देने। दोनों पक्ष के लोग अपने विचार और तर्क को सही ठहराने के लिए कुतर्क देने से भी बाज नहीं आ रहे थे तर्क और कुतर्क भी ऐसे की उनके शिक्षित होने पर भी संदेह हो रहा था एक सज्जन का कुतर्क था मोदी चोर है तभी उसने नोटबंदी कर दी चोर ही चोरी का हाल जानता है कहावत मारकर उन्होंने अपनी बात को सिद्ध करने की कोशिश की एक और आदमी बोला मोदी ने नोटबंदी से पहले अपना और पार्टी का कालाधन सफ़ेद कर दिया। दूसरे पक्ष के सज्जन ने कहा मोदी ने नोटबंदी कर अच्छा किया अबतक जितने नेता हुये ओ डरते थे उन्हें देश नही वोट की चिंता थी। तभी एक सज्जन बोले नोबंदी से गरीब और किसान परेशान हुए अमीरों को तो कुछ नहीं हुआ। लोगों के विचार मैं काफी ध्यान से सुन रहा था विद्वानों की बहस में शामिल होना उचित नहीं समझा। हमारे पास ही बैठे एक नवयुवक ने कुछ कहने की कोशिश की तो उन स्वकथित विद्वानों ने कहा "बेटा जब दो बड़े बात करें तो छोटो को नही बोलना चाहिए। मैं तो मन ही मन मुस्कुरा रहा था,करता भी क्या बड़ों की संस्कारशाला और तानाशाही के आगे लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बौनी पड़ गयी और चंद लोगों ने मुकदमा चला कर फैसला सुना डाला किसी ने मोदी को दोषी माना तो किसी ने देशभक्त और नायक।

Saturday, 19 November 2016

रिजर्व बैंक की गाईडलाइन: अगर आप नये नोट पर कुछ भी लिखते हैं तो उसे बैंक नही लेगें।

अगर आप नए नोट पर कुछ भी लिखते हैं तो उस नोट की कोई वैल्यू नहीं होगी। अर्थात नए लिखे हुए नोट बैंक नहीं लेगा। भारतीय रिवर्ज बैंक ने सभी बैंकों को सर्कुलर जारी किया है। इसमें लिखे हुए नए नोटों को न लेने के सख्त निर्देश दिए गए हैं। उल्लेखनीय है कि अब बैंकों में नोट गिनने की नई मशीनें आ रही हैं।
ये मशीनें उन नोटों को स्वीकार ही नहीं करेगी, जिन नोटों के ऊपर कुछ लिखा होगा। हालांकि, सूबे में अभी तक 2000 रुपये का नोट बाजार में आया है, लेकिन निर्देशों में 500 और 2000 रुपये के नए नोटों का जिक्र किया गया है। इसमें न लिखने की सख्त लोगों को भी हिदायत दी गई है।
गिनने वाली मशीनें भी नहीं करेंगी स्वीकार
लगभग सभी बैंकों के कर्मचारी लोगों को नए नोट देने से पहले जागरूक कर रहे हैं कि नए नोट पर कुछ भी न लिखें। लिखने से नोट बर्बाद भी हो सकता है, क्योंकि नए नोटों को गिनने वाली मशीनें इस स्वीकार नहीं करेंगी। एसबीआई मंडी के मुख्य प्रबंधक प्यार सिंह
ने कहा कि नए नोटों पर कुछ लिखा होगा तो उस नोट को नहीं लिया जाएगा। इस बारे में आरबीआई की ओर से सर्कुलर आया है। इसमें लिखे हुए नए नोटों को न लेने की हिदायत दी गई है। सभी एसबीआई और अन्य बैंकों के प्रबंधकों को इस बारे अवगत करवा दिया है।
साभार-अमरउजाला

Wednesday, 9 November 2016

मोदी की एक और सर्जिकल स्ट्राइक...

राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने कहा है कि 8 नवंबर-9 नवंबर की मध्यरात्रि से 500 और 1000 के नोट बंद हो जाएंगे। पीएम ने कहा, '500 और 1000 रुपये के पुराने नोट 10 नवंबर से 30 दिसंबर 2016 तक आप अपने बैंक या डाकघर के खाते में जमा करवा सकते हैं।' 
जनता को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आपकी धनराशि आपकी ही रहेगी, आपको कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है। किसी कारणवश अगर आप 30 दिसंबर तक ये नोट जमा नहीं कर पाए, तो आपको एक आखिरी अवसर भी दिया जाएगा। आपके पास 50 दिनों का समय है।
500 और 1000 के नोटों के अलावा बाकी सभी नोट और सिक्के नियमित हैं और उनसे लेन-देन हो सकता है।
मुख्य बातें:
-देश में किसी को भी इस फैसले की जानकारी इससे पहले नहीं मिली है, ताकि गोपनीयता बरकरार रहे। इसलिए बैंक और डाकघर जैसी वित्तीय संस्थाओं को कम समय में ज्यादा काम करना है।
-इस कारण 9 नवंबर को डाकघर और बैंक बंद रहेंगे।
-31 मार्च 2017 तक घोषणा पत्र के साथ RBI में जमा कर सकते हैं पुराने नोट।
-बाकी ऑनलाइन ट्रांजैक्शन पहले की तरह ही चलता रहेगा।
-अब 2000 रुपये के नोट और 500 के नए डिजाइन के नोटों को सर्कुलेशन में लाया जाएगा।
-सरकार ने रिजर्व बैंक के 2000 रुपये के नोटों के सर्कुलेशन का प्रस्ताव स्वीकार किया है।
-अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डों पर विदेश से आ रहे या जा रहे लोगों के पास यदि पुराने नोट हैं तो ऐसे नोटों की 5000 रुपये तक की राशि को नये और मान्य नोटों से बदलने की सुविधा दी जाएगी।
-सार्वजनिक क्षेत्र के पेट्रोल और सीएनजी गैस स्टेशन पर भी 11 नवंबर की रात 12 बजे तक पुराने नोट स्वीकार करने की छूट होगी।
-इसी तरह 72 घंटों तक रेलवे के टिकट बुकिंग काउंटर, सरकारी बसों के टिकट बुकिंग काउंटर और हवाई अड्डों पर भी केवल टिकट खरीदने के लिए पुराने नोट मान्य होंगे

Monday, 7 November 2016

खतरे में डॉल्फिन का जीवन

 'समुद्र की मुन्नी" जी हां, डॉल्फिन को समुद्र की मुन्नी कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। डॉल्फिन भले ही जल चर हो लेकिन मनुष्यों के साथ डॉल्फिन का कार्य-व्यवहार दोस्ताना होता है। विशेषज्ञों की मानें तो डॉल्फिन का विश्वास व सोच मनुष्यों की भांति ही होता है। अमूमन डॉल्फिन अकेले रहना पसंद नहीं करती क्योंकि उसे अकेलापन अच्छा नहीं लगता। लिहाजा डॉल्फिन समूह में रहती है। समूह में आैसत दस से बारह सदस्य होते हैं। डॉल्फिन सामान्यत: आवाज व ध्वनि तरंगों से एक दूसरे की पहचान करती हैं। खास बात यह होती है कि उसकी मुंह से निकली ध्वनि तरंगें अन्य जीव-जंतुओं से टकरा कर वापस लौट आती हैं जिससे डॉल्फिन के लिए यह जानना आसान हो जाता है कि शिकार कितना बड़ा व कितना करीब है। डॉल्फिन आपस में बातचीत करते हैं तो सीटियों की आवाज निकलती है। यूं कहा जाये कि उनकी बातचीत सीटियों की ध्वनि तरंगों पर आधारित होती है तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। डॉल्फिन के चलने की रफ्तार साठ किलोमीटर प्रति घंटा होती है। कभी कभी डॉल्फिन इससे भी अधिक रफ्तार में चलती हैं। खास बात यह है कि डॉल्फिन जल चर होती है लेकिन पानी के अंदर सास (श्वांस) नहीं लेती। सास लेने के लिए डाल्फिन हर दस से पन्द्रह मिनट पर पानी के उपर आती रहती है। डॉल्फिन की याददाश्त जबर्दस्त होती है। विशेषज्ञों की मानें तो डॉल्फिन बीस वर्ष के बाद भी ध्वनि तरंग को याद रखने में समर्थ होती है। कोई डॉल्फिन साथी बिछड़ जाये तो वर्षों बाद भी वह ध्वनि तरंगों से पहचान लेगी। डॉल्फिन पार्क  सबसे अधिक जापान में पाये जाते हैं। हालांकि थाईलैण्ड व सिंगापुर में भी काफी तादाद में डॉल्फिन पार्क हैं। डॉल्फिन पार्क में घूमने-फिरने आने-जाने वालों की संख्या बहुतायत में होती है। देश में डॉल्फिन  का अस्तित्व खतरे में माना जा रहा है क्योंकि डॉल्फिन की संख्या दिनो 
दिन कम होती जा रही है। देश में डॉल्फिन खास तौर से गंगा, उसकी सहायक नदियों व ब्राह्मपुत्र नदी में पायी जाती है।  इन नदियों की धाराओं में एक दशक पहले डॉल्फिन की संख्या आठ सौ से अधिक थी। बनारस में गंगा के घाटों पर भी पहले कभी-कभी डॉल्फिन दिख जाती थी लेकिन अब डॉल्फिन बनारस में गंगा के घाटों पर नहीं दिखती। शायद यही कारण रहा होगा जिससे कि डॉल्फिन का अस्तित्व संकट में देख कर भारत सरकार ने वर्ष 2010 में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया था। डॉल्फिन की आबादी या उनकी संख्या देख कर नदी की सेहत या उसके जल की शुद्धता का अनुमान लगाया जा सकता है। ऐसा नहीं है कि डॉल्फिन की अस्तित्व रक्षा के लिए देश में कहीं कुछ नहीं हो रहा है। बिहार की राज्य सरकार ने जलीय जीव डॉल्फिन के संरक्षण व अस्तित्व विकास के लिए डॉल्फिन शोध केन्द्र बनाने का एलान किया है। शोध एवं अनुसंधान के इसी क्रम में आस्ट्रेलिया में डॉल्फिन की एक नयी प्रजाति वैज्ञानिकों को मिली है। जिससे डॉल्फिन की वंश परम्परा को प्रोत्साहन व बल मिलेगा। डॉल्फिन की अस्तित्व रक्षा के लिए नदी में जल प्रवाह होने के साथ साथ गहराई भी होनी चाहिये क्योंकि नदी की गहराई व जल प्रवाह ही डॉल्फिन के जीवन का आधार है। डॉल्फिन इंसान का एक अच्छा दोस्त भी है। इसलिये डॉल्फिन के जीवन को बचाने के लिए नदियों में जल प्रवाह व जल की शुद्धता लाने की भी सार्थक कोशिश होनी चाहिए ताकि डॉल्फिन के साथ खुल कर मनोरंजन कर सकें।

Tuesday, 1 November 2016

मुश्लिम वोटों की सियासत....

देश में कई चिंतक और विचारक ऐसे है जो एक खास किश्म के चश्मे रखते हैं। चश्मे से वह अपना वोट बैंक देखते हैं तभी बोलते हैं और जब भी बोलते हैं तो वह जहर ही उगलते हैं। कश्मीर में एक महीने में 27 स्कूल जलाये गए बांग्लादेश में 19 मन्दिर जलाये गए कोई नहीं बोला,भोपाल जेल में तैनात रमाशंकर यादव की शहादत पर भी वो चुप रहे, J&K शहीद जवानों के घर कोई बड़ा नेता नहीं गया,कश्मीर में दर्जनों लोग मारे गए कोई नहीं बोला लेकिन देश के कथित महान विचारकों को ये चिंता खाये जा रही है कि सिमी के 8 आतंकवादियों की मौत कैसे हुई ? किसी भी घटना को सियासी रंग देकर वो सरकार को मुश्लिम विरोधी ठहराने की पुरजोर कोशिश करते हैं कुछ देश के पढ़े लिखे अनपढ़ मुश्लिम वोट पाने के लिए कुछ भी क गुजरने को तैयार हैं। इसी देश में कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी नहीं मानते आतंकियो को मौत की सजा दिए जाने पर आतंकी प्रेमी गैंग मुश्लिम वोटों के लिए मातम मनाते हैं।

केवल मुँह से कब तक देंगे मुहतोड़ जवाब.....

आज पाकिस्तान की भारी गोलीबारी में 8 लोगों की मौत हो गयी और 21 लोग घायल हैं।भारत के जिम्मेदार लोग बस मुह से मुहतोड़ जवाब देते हैं।मुहतोड़ जवाब शब्द सुनते सुनते कान पक गया है मैं तो कहता हूं जो लोग इस शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं पाकिस्तान के खिलाफ जवाब देने में उनको दुबारा अध्ययन करने की जरूरत है। एक आम आदमी भी शब्द का अर्थ समझता है कि मुहतोड़ जवाब का मतलब है ऐसा जवाब देना जिससे दुश्मन फिर हिमाकत न कर पाये यानि परास्त कर देना। यहां क्या है जितना मुहतोड़ जवाब मुह से दिया जा रहा है पाकिस्तान अपना हमला उतना ही तेज कर रहा है। शर्म आनी चाहिए देश के बयानवीरों को।

Friday, 28 October 2016

खुला खत.....यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली पर सीएम और डीजीपी के नाम...

खुला खत...

सेवा में
   अखिलेश यादव मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश सरकार और डीजीपी जावेद अहमद यूपी पुलिस,
महोदय,
मैंने अंग्रेजों की गुलामी और अत्याचारों को तो नहीं देखा लेकिन जैसा मैंने किताबों में पढ़ा और लोगों से सुना उस दौर की पीड़ा और अत्याचार की झलक यूपी पुलिस के व्यवहार में साफ दिखाई देती है। जिससे लोगों को हमेशा दो चार होना पड़ता है। श्रीमान जी यूपी पुलिस को नैतिकता और लोगों की गरिमा का सम्मान करना सीखाना होगा। आप लोगों के तमाम दावों और वादों पर यूपी पुलिस पानी फेर देती है। ये लोग जब भी बोलेंगे उसमे अगर गाली और गुस्सा न हो यह  दुनिया का बड़ा आश्चर्य होगा। भ्रष्टाचार और अत्याचार तो इनकी रगों में भरा पड़ा है। दो-चार अच्छे कामों पर इनके कारनामे पानी फेर देते है गांव और समाज में अभी भी पुलिस का खौफ अंग्रेजों के ज़माने वाला ही है। लोगों के जेहन में पुलिस का नाम आते ही सिहरन सी हो जाती है। पुलिस को पब्लिक से जोड़ने के दावों की हवा निकल चुकी है। समझ में नहीं आता की कानून की रखवाली के नाम पर पुलिस को गैर कानूनी काम करने का अधिकार किसने दे दिया। मानवाधिकारों,कोर्ट के आदेशों तथा तमाम रूल और रेगुलेशन की धज्जियां उड़ाकर पुलिस अपनी तानाशाही दिखाती है जिससे कई बार हम भी दो चार हो चुके हैं। भारत जैसे बड़े लोकतान्त्रिक देश में पुलिस के अमानवीय कारनामे बेहद शर्म की बात है। मुझे समझ में नहीं आता कि उपर के बड़े पुलिस अफसरों और सत्ता में बैठे जिम्मेदारों को यह सब पता नहीं है या उन्हें सब कुछ पता है और वे बेबस है कुछ कर नहीं पाते। कारण चाहे जो कुछ भी हो लेकिन इसका खामियाजा आम लोगों को अपना गौरव और सम्मान देकर चुकाना पड़ता है। जो सही मायने में अपराधी और माफिया है उनके आगे पुलिस बेबस है। पुलिस अपनी मर्दानगी गरीबो,मजदूरों या आम बेसहायों पर दिखाती है। लोगों के गरिमापूर्ण जिंदगी जीने और स्वतंत्रता के अधिकारों को पुलिस ने बेमानी साबित कर दिया है। एक कहावत है समरथ को नहीं नाथ गोसाई। यानि अगर आपके पास पैसा है पावर है आप समर्थ हैं तो आपके लिए सबकुछ जायज है पुलिस भी इनके साथ अतिथियों जैसे पेश आती है। वही गरीब ,मजदुर और असहायों के साथ पुलिस अपनी मर्दानगी दिखाती है कभी कभी तो क्रूरता की हदों को भी पार कर देती है कानूनी धाराएं लादने में इनका कोई शान ही नहीं है। पुलिस के रवैये से आम आदमी काफी भयभीत रहता है और वह कभी पुलिस के पचड़े में नहीं पड़ना चाहता,कई बार तो लोग पुलिस के डर से ही घायलो को अस्पताल पहुचाने का भी साहस नहीं जुटा पाते। पुलिस की जो छवि है वह किसी से छुपी नहीं है हकीकत सबको मालूम है लेकिन समाधान कब और कैसे होगा किसी को नहीं पता। सरकारें बदलती रहीं अगर कोई चीज नहीं बदली तो वह है पुलिस की छवि और कार्यप्रणाली। पुलिस विभाग में अच्छे लोग नहीं है ऐसी बात नहीं है लेकिन अच्छे लोगों की छवि और मेहनत पर पानी फेरने के लिए उससे कई गुना ज्यादा लोग हैं। मैं चाहता हूँ कि लोगों के मानवाधिकार और गरिमा की रक्षा हर हाल में सुनिश्चित की जाये और इसके लिये सभी जरुरी कदम उठाये जायें।
                                               धन्यवाद
                               आपका- धर्मपाल यादव

Monday, 19 September 2016

देश की जनता करे पुकार एक्शन ले मोदी सरकार

देश की जनता करे पुकार 
एक्शन ले मोदी सरकार 
बहुत हुआ धोखे से वार 
कर दो दुश्मन का संहार 
पाप की गगरी भर चुकी है 
सवाल उठ रहे हमारी जवानी पर 
भारत माता की इज्जत के लिए 
देश तैयार है हर क़ुरबानी पर 
इससे पहले की हम आपा खो दें 
जाग जाओ मोदी सरकार 
दुःख जताने और निंदा से नहीं बनेगी बात 
दुश्मन को दिखा दो भारत की औकात 
एक युद्ध और हो जाने दो 
पाकिस्तान को खो जाने 
दे दो छूट जवानों को 
लाहौर में तिरंगा फहराने को 

Sunday, 11 September 2016

हिंदी, तेरा क्या होगा ?

 14  सितंबर को हिंदी दिवस  है। एक बार फिर सरकारी संस्थाओ ,स्कूलों ,विश्वविद्यालयों आदि स्थानों  पर हिंदी दिवस खूब धूमधाम से मनाया जायेगा। हिंदी को बढ़ाने और अपनाने के लिए खूब लंबी-चौड़ी बातें होगी। अंग्रेजी में बात करने वाले राजनेता,विद्वान , अधिकारी खूब डींग हाकेंगे लगेगा उनके जैसा हिंदी का हिमायती दूसरा  कोई  नहीं। आज हिंदी दिवस मात्र औपचारिकता भर रह गया है। हिंदी दिवस के दिन विद्वान लोग हिंदी की दुर्दशा पर अपनी भड़ास निकालते हैं और शाम होते ही सबकुछ बिसरा देते हैं। हिंदी की दुर्दशा पर आंसू  बहाने वाले राजनेताओं, बुद्धिजिवियों,लेखकों,अधिकारियों आदि का सबकुछ अनौपचारिक होता है। हकीकत तो यहीं है कि हिंदी की दुर्दशा के लिए सबसे अधिक यहीं लोग जिम्मेदार हैं। सबसे बड़ा सवाल है कि हिंदी का क्या होगा ? आज लोग अंग्रेजी बोलने में गर्व महसूस करते हैं उन्हें हिंदी बोलने में  शर्म महसूस होती है। लोगों ने तो  हिंदी को  बिसराया ही है रही सही कसर सरकारों की उदासीनता ने पूरी कर दी है। सरकार से लेकर शैक्षणिक संस्थानों ने हिंदी के साथ सौतेला व्यवहार किया है।वर्तमान की अंग्रेजी केंद्रित शिक्षा प्रणाली से समाज का एक बड़ा तबका ज्ञान से वंचित हो  रहा है और लोगों के बीच आर्थिक और वैचारिक असमानता उत्पन्न हो रही है।जब छात्र  विभिन्न परीक्षाओं में असफल रहते हैं तो इसका कारण ये बताया जाता है कि ये लोग अपनी भाषा के माध्यम से पढ़े हैं इसलिए ख़राब हैं कितने शर्म बात है लोह अपनी  मानसिकता और शिक्षा प्रणाली को बदलते नहीं  और भाषा  को दोष  हैं । अब तो  उच्च और मध्यम वर्ग के लोगों में  अपने बच्चे को इंग्लिश  कान्वेंट स्कूलों में पढ़ाने की होड़ सी मच गयी हैं उनके घर पर भी  हिंगलिश शब्दों  का प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा  है ।ज्यादातर कान्वेंट के  बच्चों को हिंदी की गिनती या वर्णमाला का मालूम होना अपने आप में एक चमत्कार ही सिद्ध होगा।क्या विडम्बना  है क्या यही हमारी आज़ादी का प्रतीक है मानसिक रूप से तो अब भी हम  अंग्रेज़ियत के गुलाम हैं।आधुनिकरण के इस दौर में जितनी अनदेखी और दुर्गति हिंदी की हुई है उतनी शायद हीं कहीं  किसी और भाषा की  हुई हो।
भारतीय भाषाओं के माध्यम के विद्यालयों का आज जो हाल है वो किसी से छुपा नहीं है। सरकारी व सामाजिक उपेक्षा के कारण ये स्कूल आज केवल उन बच्चों के लिए हैं जिनके पास पैसे नहीं हैं या वह सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में रहते हों। अगर यहीं हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हिंदी को बचाने के लिए वन संरक्षण और जल संरक्षण जैसे अभियान चलाने की जरुरत पड़े।अब भी वक्त है कि हम लोग सुधर जाएँ वरना समय बीतने के पश्चात हम लोगों के पास खुद को कोसने और पछताने के सिवाय  कुछ न होगा  हो सकता है कि किसी को कोई फ़र्क न पड़े यहाँ  सवाल है आत्मसम्मान का  अपनी भाषा का और अपनी संस्कृति का।ठीक है आज की आधुनिकता और बदलते परिवेश में  अंग्रेजी जानना जरुरी  है लेकिन हिंदी से दुरी बुरी है। सूचना  और तकनीकी  के विकास से हम अंग्रेजी की पुस्तकों को भी  हिंदी में अनुवाद करके पढ़ सकते हैं। हिंदी हिंदुस्तान की  पहचान  है। आज हिंदी दिवस के आयोजन  को रस्मअदायगी की औपचारिकता से ऊपर उठाने  की जरुरत है। हिंदी हमारी सांस्कृतिक विरासत है और इसे अक्षुण्ण बनाये रखना हमारी जिम्मेदारी है। 

Thursday, 25 August 2016

जानें रियो ओलंपिक में क्यों पड़ा पदकों का अकाल....

  • रियो ओलंपिक से भारतीय टीम की वापसी के बाद सबके मन में यह सवाल उठ रहा होगा की आखिर ओलंपिक में भारत के लिए पदकों का अकाल क्यों पड़ गया साक्षी मालिक और पी.वी.सिन्धु की सफलता के बीच हमे यह नहीं भूलना चाहिए की हमारे देश की आबादी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है मेडल का अकाल एक बार की पीड़ा नहीं है,हर बार स्थिति यही होती है हम मंगल पर अपना यान भेजकर,ब्रम्होस मिसाइल का परीक्षण कर ,अपनी अर्थव्यवस्था के विकास को लेकर अपने आप को अमेरिका ,रूस ,ब्रिटेन ,चीन आदि देशो के क्लब में शामिल होने का दावा तो करते है लेकिन हम इस सवाल का जवाब क्यों नहीं खोज पाते कि हम खेल में इतने पीछे क्यों ? हम इस बात की पड़ताल के लिए खेल की जमीनी हकीकत जानेंगे हमारा देश दुनिया के सबसे अनफिट देशों में गिना जाता है सबसे बड़ी पीड़ा की बात यह है कि जिन बच्चों के कंधो पर देश का भविष्य है उनमे से लगभग आधे बच्चे कुपोषण के शिकार हैं आज से 10 साल पहले अधिकांश स्कूलों में खेल का एक घंटा निर्धारित होता था जिसमे बच्चे खेलते –कूदते थे जिससे उनका शारीरिक एवं मानसिक विकास होता था आज के दौर में दुकानों की भांति स्कूल खूल गये हैं उन स्कूलों में खेल के मैदान केवल कागजों पर ही विद्यमान होते हैं आज के बच्चे खेल के मैदान में खेलने की अपेक्षा मोबाइल या कंप्यूटर पर गेम खेलने में ज्यादा रूचि लेते हैं हमारे यहाँ ज्यादातर लोग अब भी पुरानी कहावत पढोगे लिखोगे बनोगे नवाब खेलोगे कूदोगे होगे ख़राब की जंजीरों में जकड़े हुए है हम अपने देश से पदक की उम्मीद तो करते हैं लेकिन देश के ज्यादातर लोग अपने बच्चों को खेलने देना नहीं चाहते देश के खिलाडियों को सरकार उचित संसाधन नहीं दे पा रही जिससे खिलाड़ी बेहतर अभ्यास  नहीं कर पाते खेलों में  भारत की दुर्दशा  के लिए देश की  गरीबी भी जिम्मेदार है। गरीबी के कारण महंगे संसाधनों वाले खेल खेलना मुश्किल हो जाता है फिर चाहे भारत के खिलाडियों में  कितनी ही प्रतिभा क्यों न हो।हालाँकि तमाम परेशानियों और बाधाओं को पार कर सिन्धु ,साक्षी ने देश का मान बढाया   हमारे देश में लोग आज भी  लड़िकयों को लेकर प्रगतिवादी सोच नहीं रखते। गांवों की लड़िकयों को खेलों में  आगे बढ़ने के मौके नहीं मिल पाते भारत के इस प्रदर्शन के लिए एक कारण क्रिकेट भी है देश में क्रिकेट को जो स्थान प्राप्त है वह किसी और खेल को नहीं मानव संसाधन विकास मंत्रालय की एक स्टैंडिंग कमेंटी की रिपोर्ट में सामने आया कि भारत में केंद्र और राज्य सरकार मिलकर एक एथलीट पर प्रतिदिन 3 पैसे खर्च करती हैं जबिक अमेरिका अपने हर खिलाडी पर एक दिन में 22 रूपये  खर्च करता है। इसी तरह इंग्लैंड  रोज़ 50 पैसे अपने हर खिलाडी पर खर्च  करता है और जमैका जैसा देश भी अपने खिलाडियों पर 19 पैसे प्रतिदिन खर्च करता है भारत में ज्यादातर अभिभावक करियर के रूप में खेल को नहीं देखते हमारे देश में आपको गली और मुहल्लों में धार्मिक स्थल तो आसानी से नजर आ जायेंगे लेकिन लाखों की आबादी पर शायद ही कही स्टेडियम नजर आये देश में खिलाडियों को प्रशिक्षित करने के लिए अच्छे कोचों की भरी कमी है आने वाले समय में देश को पदकों की संख्या में इजाफा करना है तो सही नीति और नियत से प्रयास करना होगा खेल को प्रोत्साहन देने के साथ ही 8 वीं तक अनिवार्य विषय के रुप में शामिल कर देना चाहिए आने वाले समय में इंटरनेशनल बेइज्ज्ती से बचने के लिए अब समय इमानदारी के साथ कुछ करने का है

Sunday, 21 August 2016

सावधान ! सेल्फी से सेल्फाइटिस का खतरा

स्मार्टफोन ने युवापीढ़ी की जिंदगी को ही बदल दिया है ।सेल्फी का क्रेज युवाओं के सर चढ़कर बोल रहा है सेल्फी शब्द लोगों की जुबान पर ऐसे चढ़ा की उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है 2013 में तो इसे ऑक्सफोर्ड वर्ड ऑफ़ द ईयर बना दिया गया एक अनुमान के मुताबिक पिछले सालों के मुकाबले इसका प्रयोग 1700 गुना ज्यादा बार किया गया । बाइक या स्कूटी चलाते हुए,नदियों की लहरों पर नौकाविहार के दौरान,चलती ट्रेन ,आटो,बस आदि से यात्रा के वक्त किसी उंची इमारत पर खड़े होकर आदि तरीकों से सेल्फी लेना( मोबाइल से खुद की फोटो लेना ) आज के युवाओं का पसंदीदा शौक  बनता जा रहा है। एक नए अध्ययन में यह बात सामने आयी है कि लड़कियां एक हफ्ते में पांच घंटे सेल्फी लेने में बिताती हैं अध्ययन में यह पाया गया कि अच्छी सेल्फी लेने में इतना समय मेकअपऔर अच्छे एंगल की तलाश में लगता है ।इतना ही नही दिन भर में कई बार अपनी फोटो को खींचकर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर पोस्ट करना एवं लाइक या कमेंट का इंतजार करना युवाओं की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। लाइक या कमेंट न मिलने या कम मिलने पर उनके अंदर चिड़चिड़ापन या बेचैनी जैसी समस्या पायी जा रही है। अगर आप भी सेल्फीबाज हैं तो सावधान हो जाइये। अमेरिकन एसोसिएशन आफ साइकियाट्रिक ने  सेल्फी की लत को “सेल्फाइटिस” नामक बीमारी घोषित  किया है। सेल्फाइटिस के लक्षणों में बार -बार खुद की ही फोटो खींचना और उसे सोशल साइटस पर पोस्ट करना पीड़ित की मजबूरी सी बन जाती है। ऐसे लोगों के मन में फोटो को लेकर विचारों की बाढ़ सी आ जाती है जैसे ये फोटो ज्यादा अच्छा नही है दूसरा खींचते हैं,मेरे फोटो पर लाइक और कमेंट कम मिले क्यों आदि जैसे तमाम सवाल व्यक्ति के मन में आते रहते हैं और उसके स्वभाव मे व्याकुलता एवं चिड़चिड़ापन पैदा कर देते हैं। कुछ तो मामले ऐसे भी सामने आये जिसमे व्यक्ति शोकाकुल माहैाल में भी खुद को सेल्फी लेने से नही रोक पाये। मनोचिकित्सकों का मानना है कि शोकाकुल माहौल में सेल्फी लेना एक असभ्य एवं संवेदनहीन व्यवहार है। अभी कुछ दिनों पहले मुम्बई पुलिस ने 16 जगहों को "नो सेल्फी जोन "घोषित किया है यह कदम सेल्फी लेने के दौरान कई लोगों की मौत हो जाने के कारण उठाया गया है । दुनिया में 2015 में सेल्फी की वजह से कुल 27 मौतों में से 15 मौतें अकेले भारत में हुई ।कुछ शोधों  में यह भी पता चला है है की स्क्रीन की नीली रोशनी त्वचा को नुकसान पहुँचा  सकती है ।अगर आप भी ऐसी आदत के शिकार हैं तो सावधान
हो जाइये क्योंकि आप भी अनजाने में सेल्फाइटिस जैसे मानसिक रोग की गिरफ्त में आ रहे हैं । किशोरों एवं युवाओं में यह मनोरोग तेजी से पांव पसार रहा है।